Kamal Ki Kalam
Dukh: Udbhav, Karan Aur Nidan
लेखक: Kamlesh Kumar Kamal
प्रकाशन वर्ष: 2025
"प्रख्यात भाषाविज्ञानी कमलेश कमल की यह चिंतनोन्मुख कृति दुःख को मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विमर्श के रूप में प्रस्तुत करती है। 36 निबंधों के इस संग्रह में दुःख, अकेलापन, अपेक्षा, मोह, असफलता, वैराग्य एवं आत्मसंघर्ष जैसे केंद्रीय विषयों पर सहज शैली गहन विश्लेषण में किया गया है।
कृति दुःख से पलायन के बजाय उसके हेतु-प्रक्रिया को समझकर आत्म-परिष्कार एवं जीवन-बोध की ओर प्रेरित करती है। मनोविज्ञान, दर्शन, साहित्य एवं जीवनानुभव का इसमें सूक्ष्म समन्वय है। विद्वज्जन इसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं कुबेरनाथ राय की निबंध-परंपरा का समकालीन विस्तार मानते हैं।
लेखक का दावा है कि यह कोई चामत्कारिक उपाय नहीं, अपितु दुःख-समझ की सम्यक् दृष्टि प्रदान करती है। लालित्यपूर्ण भाषा, गहन चिंतन एवं व्यावहारिक दृष्टि से युक्त यह कृति पाठक को आंतरिक विवेचना के लिए बाध्य करती है तथा परिपक्व, संतुलित जीवन की ओर उन्मुख करती है।"
कृति दुःख से पलायन के बजाय उसके हेतु-प्रक्रिया को समझकर आत्म-परिष्कार एवं जीवन-बोध की ओर प्रेरित करती है। मनोविज्ञान, दर्शन, साहित्य एवं जीवनानुभव का इसमें सूक्ष्म समन्वय है। विद्वज्जन इसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं कुबेरनाथ राय की निबंध-परंपरा का समकालीन विस्तार मानते हैं।
लेखक का दावा है कि यह कोई चामत्कारिक उपाय नहीं, अपितु दुःख-समझ की सम्यक् दृष्टि प्रदान करती है। लालित्यपूर्ण भाषा, गहन चिंतन एवं व्यावहारिक दृष्टि से युक्त यह कृति पाठक को आंतरिक विवेचना के लिए बाध्य करती है तथा परिपक्व, संतुलित जीवन की ओर उन्मुख करती है।"